किसान चेयरमैन विरेन्द्र सहू सीडलैस किंन्नू और माल्टा, मौसमी व नींबू की नर्सरी में
पौध तैयार कर रहे कमाई
नाथूसरी चोपटा पंचायत समिति के चेयरमैन विरेंद्र सहू को
राजनीति, समाजसेवा से मिली शोहरत तो बागवानी ने दिलाई दौलत
नरेश बैनीवाल
चोपटा -राजस्थान की सीमा से सटे
हरियाणा के पैंतालिसा क्षेत्र में रेतीली जमीन है जिसमें परंपरागत खेती से आमदनी कम
हो जाती है। और आर्थिक स्थिति डावांडोल हो जाती है। लेकिन गांव गिगोरानी के किसान
(अब नाथूसरी चोपटा पंचायत समिति के चेयरमैन) विरेंद्र सहू ने हौसला हारने की बजाए
कमाई का जरिया खोजा। उसने अपने घर की आर्थिक स्थिति को मजबूत बनाए रखने के लिए 22
एकड़ भूमि में किन्नू का बाग लगाया व 8 एकड़ में आग्रेनिक अमरूद लगाए। इससे
परंपरागत कृषि के साथ अतिरिक्त आमदन शुरू हो गई। इसके अलावा सीजन के अनुसार
विरेंद्र सहू द्वारा अपने खेत में इजराइली विधि से लगाए गए तरबूज व खरबूजा को
क्षेत्र के लोग काफी पसंद करते हैं। इस कमाई के साथ साथ किसान विरेंद्र सहू ने
सीडलैस किन्नू व मोसमी, माल्टा व नींबू के पौधे तैयार कर बेचने से कमाई का दायरा भी
बढा़ लिया है। वर्णिका सहू फ्रूट नर्सरी गिगोरानी में तैयार उच्च क्वालिटी के पौधों
को क्षेत्र के लोग काफी पसंद कर रहे हैं। लीक से हटकर कुछ करने के जज्बे ने राजनीति
व समाजसेवा के साथ साथ विरेंद्र सहू को हरियाणा के साथ- साथ निकटवर्ती राजस्थान के
आस पास के गांवों में अलग पहचान भी दिलवाई। आधुनिक खेती, राजनीति व समाजसेवा के
जज्बे के साथ कम उम्र में ही किसानों के लिए प्रेरणा बन गया।
विरेंद्र सहू ने बताया कि एमए हिन्दी तक पढने के बाद खेती
पर ध्यान देना शुरू किया तो परंपरागत खेती के साथ आधुनिक खेती करने के इरादे से साल
2003-04 में अपने 22 एकड़ भूमि में किन्नू का व 8 एकड़ में आग्रेनिक अमरूद लगाए।
जिसमें अपने माता पिता का पूरा सहयोग मिला। इसी के साथ साथ $कृषि विभाग से डॉ
लक्ष्यवीर बैनीवाल व डीएचओ सतवीर शर्मा की पे्ररणा से परंरागत खेती के साथ साथ
अतिरिक्त कमाई का जरिया शुरू होने के बाद पिछले तीन वर्षों से किन्नू, मोसमी व
नींबू की पौधे तैयार कर बेचने से कमाई और बढ़ गई है। उसने बताया कि इतनी व्यस्त
जीवनशैली होने के बावजूद भी वह हर रोज सुबह 5 बजे से तीन या चार घंटे बाग में पौधों
की देखभाल अवश्य करता है । इसके बाद क्षेत्र के लोगों की समस्याओं को सुनकर समाधान
में जुट जाता है। विरेंद्र सहू ने बताया कि सरकार के सहयोग से उसने खेत में एक पानी
की डिग्गी भी बना ली है। उस डिग्गी में पानी इक्टठा करके रखता है जब भी सिचांई की
जरूरत होती है, तभी किन्नू के पौधों व फसलों मे सिंचाई कर लेता है। किन्नू के पौधों
में जल्दी सिंचाई की जरूरत नहीं होती। वह सिंचाई ड्रिप सिस्टम द्वारा की जाती है ,
जिससे पानी व ,खाद व दवाई सीधे पौधों को मिल जाती है। तथा पानी बेकार नहीं जाता।
वर्णिका सहू फ्रूट नर्सरी गिगोरानी में तैयार पौध
बन रही है किसानों की पहली पंसद।
विरेंद्र सहू ने बताया कि क्षेत्र के किसान बागवानी
करना चाहते हैं उन्हें किन्नू व अमरूद आदि के पौधे पंजाब के अबोहर व फाजिल्का से
लाने पड़ते हैं। इतनी दूर से पौधे लाने में खर्च भी काफी आता है। इसी समस्या को
देखते हुए उन्होंने गांव गिगोरानी में अपने खेत में वर्णिका सहू फ्रूट नर्सरी बनाकर
पंजाब एग्रीकल्चर यूनिवर्सिटी से सीडलैस किन्नू की किस्म लाकर नर्सरी में ही पौधे
तैयार करने लगा। इसके साथ ही मौसमी, माल्टा व नींबू की कई किस्मों को भी तैयार पौधे
तैयार किए जाते हैं। अब किसानों को अन्य राज्यों या दूर से पौधे नहीं लाने पडेंग़े।
उसने सबसे पहले गांव में बाग लगाया। उसके बाग को देखकर गांव के कई किसानों ने भी
किन्नू के बाग लगाकर कमाई शुरू कर दी है। आस पास के कई् गांवों के किसान किन्नू क ा
बाग देखनें के लिए आते हैं और परंपरागत खेती के साथ अतिरिक्त कमाई का जरिया देखकर
खुश होते हैं। अब अपने खेत में ही पौधों की नर्सरी तैयार कर ली है जिससे बागवानी
करने वाले किसानों को विभिन्न किस्मों के पौधे यहीं मिल जाएंगें। इसके साथ ही
नर्सरी में तैयार पौधे भी ले जाने लगे हैं। इसके साथ ही पौध तैयार करने की जानकारी
भी देता है इसके लिए मोबाईल नं 90688-00004 पर जानकारी ली जा सकती है।
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तरबूज व खरबूजे को भी मिलती है सराहना
विरेंद्र
सहू ने बताया कि इजराइली विधि से मलिंयग पर ताईवान कम्पनी के खरबूजा व तरबूज की
बेलों पर लगे हुए खरबूजा व तरबूज को खरीदने की तरफ काफी रूझान है। उन्होने बताया कि
इस विधि से खरबूजा व तरबूज लगाने से मात्र 90 दिनो में प्रति एकड़ के हिसाब से 2 से
ढाई लाख रूपये की कमाई हो जाती है। उन्होंने बताया कि वह सब्जियां अपने खेत में ही
उगाता है कभी भी बाजार से नहीं लाता। मौसम के अनुसार बैंगन, घीया, तोरी, टमाटर,
लहसून, प्याज, गाजर इत्यादि उगा लेता है और ताजी सब्जी ही बनाता है। सहू ने बताया
कि धान की पराली को किन्नू व अमरूद के पोधों के पास बिखेर दिया जाता है जो कि गलने
के बाद खाद का काम करती है। जिससे दो फायदे होते हैं एक तो पराली को जलाना नहीं
पड़ता जिससे प्रदूषण नहीं होता। दूसरा इस विधि से पौधो को प्राकृतिक खाद के रूप में
पोषक तत्व ज्यादा मिलते हैं।
मंडी दूर होने के कारण यातायात
खर्च ज्यादा हो जाता है
विरेंद्र सहू ने बताया कि उसके गांव से सिरसा मण्डी दूर
पड़ती है। जिससे फलों को वहां ले जाकर बेचने में यातायात खर्च ज्यादा आता है। तथा
बचत कम होती है। उसका कहना है कि अगर फलों की मण्डी या फ्रूट प्रोसैसिंग प्लांट
नाथूसरी चौपटा में विकसित हो जाए तो यातायात खर्च कम होने से बचत ज्यादा हो जाएगी।



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