धर्मनिरपेक्षता शब्द सबसे पहले 1851 में जार्ज जैकब होली ओक ने गढ़ा था । अंग्रेजी में सेक्युलर' शब्द लैटिन के 'रोकुलम' शब्द से बना है, जिसका शाब्दिक अर्थ है , यह वर्तमान युग।
यह विश्व के लिए प्रयुक्त शब्दों में से भी एक है और काफी लंबे समय तक सेक्युलर शब्द का अर्थ 'सांसारिकता' माना जाता था, जो 'धर्म' या 'पवित्रता' के प्रतिकूल था।
भारत में धर्मनिरपेक्ष और धर्मनिरपेक्षता शब्दों का प्रयोग केवल राज्य के संदर्भ मे किया गया हैं ।
इसलिए , हमारे देश में धर्मनिरपेक्ष राज्य शब्द तो कहा जाता है, धर्मनिरपेक्ष समाज कभी नहीं। इसका आंशिक कारण यह है कि भारत में धर्मनिरपेक्षता की विचारधारा पशिचम से बिल्कुल भिन्न है।
भारतीय धर्मनिरपेक्षता शब्द का प्रयोग इस अर्थ में किया जाता है कि राज्य किसी एक धर्म के साथ नहीं होगा, वरन् सभी धर्मो के प्रति उसका एक जैसा मैत्री भाव या र दूरी नहीं होगी।
निरपेक्षता के इस सिद्धांत पर कार्य करते हुए भारतीय राज्य से अपेक्षा की जाती है कि वह अंतरवर्गीय संघर्ष को रोके और उसके साथ-साथ विविधता भरे प्रतियोगी और कभी-कभी एक-दूसरे से संघर्षरत बहु-धर्मीय समाज को एक राष्ट्र के रूप में जोड़े रखे।
वर्गों की आपसी होड़ और संघर्ष तो हमारी सामाजिक विशिष्टता है। यह आशा की जाती है कि इस प्रकार की धर्मनिरपेक्ष नीति सभी नागरिकों में राष्ट्रीय भावना पैदा करेगी, जो उनकी विविध प्रकार की धार्मिक पहचान से ऊपर होगी लेकिन धार्मिक पहचान को अस्वीकार नहीं करेगी ।
इसका वास्तविकअर्थ यह है कि सभी नागरिक और विशेष से एक और तो अपने अधिकारों तथा दूसरी और अपने विश्वास और व्यवहार के बीच अंतर बनाए रखेंगे। भारत और पशिचम की धर्मनिरपेक्षता के अर्थ में यह अंतर बनाए रखेंगे । भारत और पशिचम की धर्मनिरपेक्षता के अर्थ में यह अंतर उन भिन्न ऐतिहा सिक राजनीतिक और सामाजिक परिस्थतियों के कारण है. जिनने भारत मैं धर्मनिरपेक्षता का उदय हुआ है।
धर्मनिरपेक्षी करण :पश्चिम में धर्मनिरपेक्षीकरण की शुरुआत को कुछ लोगों ने तो आधुनिक व्यक्ति की धार्मिक संरक्षण से मुक्ति' कहकर प्रशंसा की ही कुछ अन्य लोगों ने इसे ईसाईकरण, विधर्मी बनाए जाना आदि कहकर शोक व्यक्त किया।
लेकिन ऐतिहासिक रूप से समाज वैज्ञानिकों के लिए धर्मनिरपेक्षीकरण की प्रक्रिया पश्चिम में आधुनिकता के उदय से जुड़ी हुई है और कुछ लोग इसे 'पिछले सैकड़ों वर्षों का शायद सर्वाधिक महत्वपूर्ण विकास मानेंगे। पारपरिक चर्च-उन्मुख धर्म में हाल ही में हुए प्रत्यक्ष हास के कारण धर्मनिरपेक्ष करण की प्रक्रिया आगे बढ़ी के कारण और वर्तमान पराकाष्ठा की स्थिति में पहुँची।
फिर भी यह एसी प्रक्रिया है जिसके मूलाधार प्रमुख धर्मों की नींव से ही जुड़े हुए हैं और वस्तुतः यह उस विशिष्ट तथ्य से ही एक अस्पष्ट और द्वंद्वात्मक संबंध रखती है. जिसे यह तथाकथित रूप से क्षति पहुंचाती है। इस परिप्रेक्ष्य में, धर्मनिरपेक्षता इस हद तक एक पश्चिमी संकल्पना है कि धर्मनिरपेक्ष करण वह प्रक्रिया है जो पश्चिमी समाज में स्थित है।
ब्रायन विल्सन ने 'धर्मनिरपेक्षीकरण' को ऐसी प्रक्रिया कहकर परिभाषित किया है जिसमें विभिन्न सामाजिक संस्थाएँ ऐसी विशिष्ट संस्थाओं के रूप में मान्यता प्राप्त करती है जो पर्याप्त स्वायत्ता से कार्य संचालन करती हैं।
यह 'धार्मिक गतिविधियों, विश्वासों, सोचने के तरीके और संस्थाओं में हास की प्रक्रिया भी है। धार्मिक चेतना में होने वाला यह हास धर्मनिरपेक्ष मुद्दों के प्रति व्यावहारिक या वैज्ञानिक दृष्टिकोण की विश्वव्यापी स्वीकृति का परिणाम है।
एक धर्मनिरपेक्ष समाज में लोग प्राकृतिक तथ्य की व्याख्या हेतु और अपनी सांसारिक समस्याओं के लिए उपचारी उपायों हेतु विज्ञान के आश्रय में जाते हैं।
वे संसार की संज्ञात्मक जानकारी के लिए या भावनात्मक सहयोग के लिए भी अब 'आलौकिक' का सहारा नहीं लेते। परिणामस्वरूप, 'पश्चिम में धर्म पहले की तरह व्यापक या निर्णायक प्रभाव न रहकर , सामान्यतः सामाजिक व्यवस्था का विभाग बन गया है।
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