गांव रुपावास के खेतों में बनी ढाणियों में पेयजल संकट गहराया
ढाणी वासियों को 1 किलोमीटर दूर से सिर पर घड़े रख कर लाना पड़ता है पानी
चोपटा। खंड के गांव रुपावास में खेतों में बनी करीब 20 ढाणियों में पीने के पानी की कमी के कारण ढाणी वासियों को काफी परेशानी का सामना करना पड़ रहा है। इन ढाणियों में बसने वाले परिवार के लोग सुबह उठते ही पीने के पानी का प्रबंध करने में जुट जाते हैं। महिलाओं व पुरुषों को करीब डेढ़ किलोमीटर दूर सिर पर घड़े रखकर पानी लाना पड़ता है। हालांकि जन स्वास्थ्य विभाग ने रुपावास वाटर वर्क्स से पाइपलाइन तो डाल रखी है लेकिन उनमें पानी नहीं जाता जिसके कारण हर मौसम में ढाणी वासियों को पेयजल की भारी किल्लत रहती है। ढाणी वासियों का कहना है कि सरकार एक तरफ तरफ तो कहती है कि पेयजल जैसी मूलभूत सुविधाओं की कोई कमी नहीं रहने दी जाएगी। इसके साथ ही कोरोना महामारी में हर समय हाथ धोने के लिए भी प्रेरित किया जाता है लेकिन हमें तो पीने के पानी के ही लाले पड़े हुए हैं। मोहन लाल पूनिया ने बताया कि उनकी ढाणियां रुपावास गांव के खेतों में नोहर रोड पर बनी हुई है । जोकि रुपावास और रायपुर 2 गांवों के वाटर वर्क्स नजदीक पड़ते हैं लेकिन पीने का पानी नसीब नहीं होता। गर्मी हो या सर्दी हमेशा पानी सिर पर घड़े रखकर करीब 1 किलोमीटर दूर से लाना पड़ता है। चलते नाले या नहर से पानी साफ व स्वच्छ भी नहीं आता फिर भी मजबूरन यही पानी पीना पड़ता है। जन स्वास्थ्य विभाग को कई बार समस्या से अवगत भी कराया जा चुका है लेकिन ढाणियों में पाइपलाइन तो डाल रखी है परंतु पानी ढाणियों तक नहीं पहुंच पाता। पवन बोकड़ा, राजेंद्र कुमार, अजय कुमार, महावीर, कर्मवीर, मुकेश कुमार, जय वीर, राजमल आदि ने बताया कि गर्मी हो या सर्दी हर मौसम में सुबह से लेकर शाम तक पीने के पानी के प्रबंध में ही जुटे रहते हैं। पानी दूर से नाले या नहर से लाना पड़ता है कई बार तो पीने के पानी का टैंकर मंगवाया जाता है। जिससे उन्हें 500 से 700 रुपए तक भुगतान करना पड़ता है। इनका कहना है कि सरकार बार-बार मूलभूत सुविधाओं की कमी न होने देने का दावा करती है परंतु पीने के पानी जैसी समस्या से उन्हें हर वक्त रूबरू होना पड़ता है। उधर कोरोना महामारी मैं सरकार व स्वास्थ्य विभाग बार-बार उन्हें हाथ धोने के लिए प्रेरित करते रहते हैं परंतु उनके तो पीने का पानी भी बड़ी मुश्किल से मिल रहा है ऐसे में बीमारी से बचना तो दूर की बात है पहले तो प्यास बुझाने का प्रबंध करना पड़ता है। इनका कहना है कि उनके ढाणियों तक गांव के जल घर से पीने का पानी का प्रबंध किया जाए ताकि उन्हें पेयजल की किल्लत का सामना ना करना पड़े।


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