] हिन्दूओं व मुसलमानों का सांझा धार्मिक स्थल गोगामेड़ी ।।। देशभर में गोगा जी के भक्त घर पर ही कर रहे हैं गोगा जी की पूजा अर्चना।। इस बार कोरोना महामारी के कारण भादो मास में नहीं लगा गोगामेडी मेला

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हिन्दूओं व मुसलमानों का सांझा धार्मिक स्थल गोगामेड़ी ।।। देशभर में गोगा जी के भक्त घर पर ही कर रहे हैं गोगा जी की पूजा अर्चना।। इस बार कोरोना महामारी के कारण भादो मास में नहीं लगा गोगामेडी मेला

  हिन्दूओं व मुसलमानों का सांझा धार्मिक स्थल गोगामेड़ी

 

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इस बार कोरोना महामारी के कारण भादो मास में नहीं लगा गोगामेड़ी मेला 

देशभर में गोगा जी के भक्त घर पर ही कर रहे हैं गोगा जी की पूजा अर्चना

नरेश बैनीवाल
गोगामेड़ी हिंदुओं तथा मुसलमानों सहित सभी धर्मों के लोगों का सांझा धार्मिक स्थल है। जितनी श्रद्धा से या हिंदू धोक (पूजा)  लगाते हैं, उतनी ही श्रद्धा से मुसलमान भी सजदा करते हैं। हिंदू जाहरवीर गोगा जी को वीर कहते हैं, तो मुसलमान गोगा पीर के नाम से पुकारते हैं। हरियाणा से राजस्थान की सीमा पर स्थित राजस्थान के हनुमानगढ़ जिले की नोहर तहसील में यह धार्मिक और ऐतिहासिक स्थल है। गोगामेड़ी से दो किलोमीटर पहले गोगाणा में गोरखनाथ का प्राचीन धूणा स्थित है। यहां पर स्थित गोरख गंगा का अपना ही महत्व है। गोगामेड़ी मंदिर का जीर्णोद्धार किया गया है। गोगामेड़ी में यूं तो पूरे वर्ष श्रद्धालु आते रहते हैं लेकिन भादो मास में 1 महीने के लिए भारी मेला लगता है। इस बार कोरोना महामारी के चलते मेला नहीं लगा है। श्रद्धालुओं के लिए मंदिर में पूजा पूरे भादो मास के लिए स्थगित की गई है । गोगामेड़ी मंदिर से गोगा जी की समाधि के दर्शन की व्यवस्था ऑनलाइन की गई है। 


 लोक प्रचलित कथा के अनुसार उन्हें 11 वीं सदी में महमूद गजनवी के समकालीन माना जाता है सर्व सम्मत लोक मान्यता है कि राजस्थान के चुरू जिले के ददरेवा नामक ग्राम रियासत के राणा उमर सिंह चौहान राज करते थे। उनके दो पुत्रों जेवर सिंह और नेवर सिंह की शादी सिरसा पट्टन वर्तमान सिरसा हरियाणा के राजा कुंवर की दो पुत्रियों बाछल व काछल से हुई। बताया जाता है कि जब उमर सिंह को उसकी मां ने गोद में उठाए खिला रही थी, तो ढोडी पर एक फकीर आया उसने भीख मांगी तो उमर सिंह की माता ने भीख देने से मना कर दिया तो उस साधु ने श्राफ दे दिया कि उन्हें अगली पीढ़ी में संतान नहीं होगी।  जब उमर की माता को साधु के श्राफ का आभास हुआ तो उसने साधु से अपनी भूल की माफी मांगी व क्षमा प्रार्थना की। तब साधु ने रानी को कहा कि संत फकीरों की सेवा करने पर इस रियासत में पुत्र प्राप्ति होगी। समय बीतने के बाद जेवर और नेवर की शादी को कई वर्ष हो गए, परंतु उनके कोई संतान पैदा नहीं हुई राजा उमर सिंह की मृत्यु के बाद राजगद्दी राजा जेवर सिंह को बिठा दिया। लेकिन संतान के अभाव में राजा जेवर सिंह हर समय चिंतित रहते। रानी बाछल हर समय संतों की सेवा को तत्पर रहती और अपने भाग्य को कोसती रहती। इसी दौरान रियासत में राजा के सूखे बाग में गुरु गोरखनाथ अपने 14 सौ चेलों के साथ आकर ठहरे तो उनकी कृपा से पूरा भाग हरा भरा हो गया। तभी बांदी ने बाग की तरफ देखा तो उसे यकीन नहीं हुआ तो बांदी पूरी तसल्ली करने के बाद भागकर राज महल गई व रानी बााछल को साधुओं के डेरा डालने व बाग हरा-भरा होने की पूरी कहानी सुनाई। रानी ने राजा जेवर को बताया । 


राजा को गुरु गोरखनाथ के आने का पता चला तो वे सपरिवार उनके दर्शन के लिए राज उद्यान पहुंचे। जब गुरु गोरखनाथ ने राजा रानी की व्यथा सुनी तो  गुरु गोरखनाथ ने  रानी बाछल को तेजस्वी पुत्र होने का आशीर्वाद दिया । गुरु गोरखनाथ ने दूसरे दिन आकर फल ले जाने के लिए कहा।  गुरु गोरखनाथ द्वारा आशीर्वाद व रानी बाछल को पुत्र के लिए मिलने वाले फल की बात उसकी बहन काछल को पता चली तो काछल के मन में कपट आ गया, वह दूसरे दिन जल्दी उठ काछल के कपड़े पहन गुरु गोरखनाथ जी के पास पहुंची। गुरु गोरखनाथ ने उसे दो फल दे दिए।  जब रानी बाछल गुरुजी के पास पहुंची तो गोरखनाथ प्रस्थान  की तैयारी कर रहे थे ।पास आते देख महायोगी बाल ब्रह्मचारी गुस्से से भर गए और उन्होंने कहा कि ज्यादा लोभ अच्छा नहीं होता। लेकिन जब रानी बाछल ने बहन काछल द्वारा ठगने की बात बताई तो गुरु गोरखनाथ का गुस्सा शांत हुआ। गुरुजी ने रानी को गूग्गल दी और कहा कि जो भी बांझ इसका सेवन करेगी उसे एक वीर  तेजस्वी संतान की प्राप्ति होगी। रानी बाछल ने महल में आकर  थोड़ी गूगल अपनी पंडिताइन  को दी। थोड़ी सी अपनी दासी को। थोड़ी सी अपनी घोड़ी को खिला कर बाकी बची खुद खा गई। समय बीतने पर रानी बाछल के गर्भ से जाहरवीर गोगा जी का जन्म हुआ। पंडिताइन की संतान का नाम नाहर सिंह पांडे रखा गया। दासी की संतान का नाम भज्जू कोतवाल रखा गया। इसीके साथ घोड़ी ने नीले घोड को जन्म दिया। जाहरवीर गोगा जी व अरजन सरजन एक साथ खेल कर बड़े हुए एक साथ शिक्षा ग्रहण की । बड़ा होने पर जाहरवीर की शादी उत्तर प्रदेश के राजा की पुत्री सीरियल से हुई जो बेहद खूबसूरत व समझदार थी ।जाहरवीर के पिता की मृत्यु के बाद ददरेवा रियासत की राजगद्दी जाहरवीर ने संभाली।  एक बार गुरु गोरखनाथ पुनः ददरेवा पहुंचे तो राजमाता बाछल व जाहरवीर नेे गुरु गोरखनाथ बहुत आवभगत की।  तब गुरु जी के कहने पर माता बाछल ने जाहरवीर को गुरु गोरखनाथ के साथ भेज दिया। जाहरवीर गोगा जी हिंदूूंओं व मुसलमान दोनों को समान रूप से प्यारे लगते थे। वापस आकर फिर से राजकाज देखने लगे। जब मुगलों ने ददरेवा रियासत पर आक्रमण किया तो जाहरवीर ने अरजन सरजन व अपनी सेना को लेकर दुश्मन का डटकर मुकाबला किया। तब दुश्मन अपनी हार को देखकर घबरा गया तो उसने अरजन सरजन को राज्य का लोभ देकर अपनी तरफ मिला लिया। अगले दिन जब युद्ध शुरू हुआ तो अरजन सरजन दोनों तलवार लिए जाहरवीर के पीछे खड़े थे । तभी जाहरवीर  गोगा जी ने गुरु गोरखनाथ की कृपा से उनकी मंशा जान गए और दोनों को पलट कर मौत के घाट उतार दिया। युद्ध समाप्त होने के बाद राजमाता को गोगा जी द्वारा अरजन सर्जन की मौत का समाचार सुना तो वह आग बबूला हो गई और जब जाहरवीर गोगा जी राज महल पहुंचे तो राजमाता ने जाहरवीर को देश निकाला दे दिया और कहा कि कभी उसे मुंह मत दिखाना। उधर रानी सीरियल को भी सजा के तौर पर महल के पीछे एक कोठरी दे दी गई। जाहरवीर रात को छिपकर अपनी रानी सीरियल से आकर मिलने लगे। तब रानी सीरियल भी हार श्रृंगार करने लगी। जब एक दिन रानी को हार सिंगार किए हुए देखा तो वह रानी को खरी-खोटी करने लगी, तभी रानी ने बताया कि जाहरवीर हर रात उनसे मिलने आते हैं, तब राजमाता ने पुत्र द्वारा आज्ञा पालन न करने की सजा देने की सोची। और रात को छिपकर जाहरवीर का इंतजार करने लगी। जब जाहरवीर गोगा जी  रात को रानी से मिलने आए तो राजमाता ने ललकारा। राजमाता को मुंह न दिखाने की कसम के कारण गोगा जी को उल्टे कदमों से वापस लौटना पड़ा । गोगा जी ने अपना घोड़ा दौड़ा दिया तभी राजमाता बाछल ने भी हाथ में तलवार लेकर जाहरवीर के पीछे का घोड़ा दौड़ा दिया। काफी दूर तक पीछा करने के बाद जाहरवीर का घोड़ा वर्तमान गोगामेड़ी के स्थान उस समय जंगल की दलदल में फंस गया। जाहरवीर व  नीला  घोड़ा दोनोंं जमीन में समा गए। जब रानी सीरियल को इस बात का पता चला तो रानी ने भी उसी जगह समाधि ले ली। जब राज माता बााछल को पुत्र तथा पुत्र वधू द्वारा समाधि लेने का  पश्चाताप हुआ तो  बाछल ने भी समाधि स्थल के पास बैठकर अपनी जान देने का निर्णय कर लिया। माता की प्रार्थना पर जाहरवीर  प्रकट हुए और भविष्यवाणी की कि वे जनता के उप कारक के रूप में उपस्थित रहेंगे व  हिंदू मुसलमान सहित सभी धर्मों  के हितकारी होंगे ।जाहरवीर का जन्म भादो मास में नवमी तिथि को माना जाता है,  जिसे गोगा नवमी कहते हैं। इसलिए पूरे  भादो माह गोगामेड़ी में मेला लगता है। यहां पर हरियाणा, पंजाब, दिल्ली, राजस्थान, उत्तर प्रदेश, गुजरात, महाराष्ट्र, बिहार सहित देश के दूर-दूर के राज्यों के श्रद्धालु आते हैं। इस बार यह मेला 3 अगस्त से शुरू होकर 2 सितंबर तक चलना था लेकिन कोरोना काल के चलते गोगामेड़ी मेला नहीं लगा।  गोगाजी के भक्त गुरु शिष्य परंपरा का निर्वाह करते हुए पहले गोरखनाथ के धूणें पर जाकर नमन करते हैं फिर गोरख गंगा में स्नान करने के बाद 3 किलोमीटर तक पैदल चलकर कुछ पेट के बल गोगामेड़ी में जाहरवीर की समाधि पर जाकर धोक लगााेत हैं व सजदा करते हैं।गोगा जी की समाधी पर धोक लगाने के बाद 
श्रद्धालु नाहर सिंह पांडे, माता बाछल, रानी सिरीयल, भजू कोतवाल, रतना हाजी, सबल सिंह बावरी, केसरमल, जीतकौर, श्याम कौर, भाई मदारण का 
समाधियों पर धोक लगाते है। तपती रेत व सड़कों पर पेट के बल कनक दण्डवत कर पहुँच रहे लोगों की श्रद्धा देखते ही बनती थी। ढोल नगाडों पर नाचते गाते डमरू व सारंगी की लय पर आगे बढते श्रद्धालू गुरू गोरख नाथ की जय, जाहरवीर की जय,गोगापीर की जय,के गगनभेदी जयकारों से वातावरण पूरे भादो मास गुंजायमान रहता था। 


गोगामेड़ी में गोगा जी का जागरण भी होता है । भक्तों को गोगा जी की घोट छाया आती है तो भक्त अपने आप को लोहे की जंजीरों से पीटते हैं। मान्यता है कि यहां पर  सर्प दंश से किसी की मौत नहीं होती । बच्चों के मुंडन का कार्य भी यहां होता है ।अधिकांश लोग गोगाजी को सर्पों के देवता के रूप में पूजते हैं। इस बार गोगाजी के भक्त घर में ही गोगा जी की पूजा अर्चना कर रहे हैं।

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नरेश कुमार बैनीवाल
मोबाइल नंबर:- 9896737050

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